छत्तीसगढ़ सरगुजा

आम नागरिक बोले: मेरी रक्षा मैं खुद करूंगा, टैक्स मत लो, जब शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सब निजी हो गए, तो टैक्स क्यों?

by Admin on | Jan 21, 2026 05:14 AM

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आम नागरिक बोले: मेरी रक्षा मैं खुद करूंगा, टैक्स मत लो, जब शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सब निजी हो गए, तो टैक्स क्यों?

आदित्य कुमार 


सरगुजा - आज का आम नागरिक एक अजीब दुविधा में जी रहा है। संविधान उसे अधिकार देता हैलोकतंत्र उसे सुरक्षा का भरोसा देता हैऔरसरकार उससे कर (Tax) लेकर वादा करती है कि बदले में उसे शिक्षास्वास्थ्यरोजगार और सुरक्षा मिलेगी। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुलउलट नज़र आती है।आज हालात ऐसे बन चुके हैं कि आम आदमी यह कहने को मजबूर है “अगर मुझे अपनी रक्षाइलाजपढ़ाई और रोज़गार सबकुछ खुद ही करना हैतो फिर टैक्स किस बात का?”

सड़क पर निकलते ही असुरक्षा का एहसास होता है। अपराध बढ़ रहे हैंकानून का डर कमजोर पड़ता दिख रहा है। थाने आम आदमी के लिए न्यायका केंद्र नहींबल्कि डर का प्रतीक बनते जा रहे हैं। न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को न्याय मिलने से पहले हिम्मत टूट जाती है। शिक्षाका हाल यह है कि सरकारी स्कूल संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैंऔर मध्यम वर्ग को मजबूरी में महंगे निजी स्कूलों की ओर जाना पड़ता है। स्वास्थ्यसेवाओं में सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छुपी नहीं डॉक्टर नहींदवाइयाँ नहींसुविधाएँ नहीं। नतीजाइलाज भी निजीखर्च भी निजी।रोज़गार की बात करें तो युवा डिग्रियाँ लेकर सड़कों पर हैं। सरकारी नौकरियाँ सीमितनिजी क्षेत्र में शोषण आम बात। फिर भी टैक्स की दरें बढ़ती जारही हैं पेट्रोलडीज़लराशनमोबाइलइंटरनेट… हर ज़रूरत पर टैक्स।


सवाल सीधा है जब शिक्षा मैं खुद खरीदूंइलाज मैं खुद कराऊँ,रोज़गार मैं खुद ढूंढूंऔर सुरक्षा के लिए भी मुझे खुद ही सतर्क रहना पड़े तो सरकार कोटैक्स किसलिए?


यह कोई विद्रोह नहींबल्कि एक ईमानदार नागरिक की पीड़ा है। टैक्स चोरी गलत हैलेकिन टैक्स लेकर बुनियादी सुविधाएँ  देना उससे भी बड़ाअपराध है। लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवक होती हैमालिक नहीं। आज आम आदमी यह नहीं कह रहा कि वह जिम्मेदारी नहीं निभाएगा। वहसिर्फ इतना कह रहा है “अगर राज्य मेरी रक्षा नहीं कर सकतातो मुझे मेरी कमाई पर पूरा अधिकार दिया जाए।

सरकार को यह समझना होगा कि टैक्स सिर्फ राजस्व नहींबल्कि जनता का विश्वास होता है। और जब विश्वास टूटता हैतो सवाल उठते हैंज़ोरदारतीखे और जायज़। अब वक्त है आत्ममंथन का। वरना वह दिन दूर नहींजब आम आदमी यह मान लेगा कि इस व्यवस्था में सुरक्षित रहने काएक ही रास्ता है अपनी रक्षा ख़ुद करना।

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