by admin on | Dec 26, 2024 04:55 PM
।। संविधान पर महाभारत।।
संसद का शीतकालीन सत्र हंगामे और शोरगुल व धक्का-मुक्की के मध्य अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया। कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन का हमेशा से आरोप रहा है कि, मोदी सरकार संविधान को बदलना चाहती है, यहां तक कि उसके अपरिवर्तनीय स्वरूप (उद्देशिका) को भी बदलना चाहती है। और देश को तानाशाही की ओर बढ़ रही है। ऐसे ही कुछ मुद्दों पर इस सत्र में जोरदार तीखी बहस हुई। लेकिन विपक्ष को कभी कभी प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभानी पड़ती है,जिसका विपक्ष में नितांत अभाव देखा गया है।इस लेख में यह उन संविधान संशोधनों उल्लेख किया गया है जिससे संवैधानिक मर्यादा का अतिलंघन हुआ । संविधान की उद्देशिका में "संविधान भारत के लोगों द्वारा भारत को अथवा भारत के लोगों को समर्पित है, इसलिए दोनों को समर्पित है। संविधान में विभिन्न देशों से अच्छी व्यवस्थाओं को लिया गया है। जैसे, संसदीय शासन प्रणाली (इंग्लैंड) न्यायिक सर्वोच्चता (यूएसए) संविधान संशोधन (द०अफ्रीका ) आपातकाल (जर्मनी) इत्यादि से लिए गए हैं।संविधान संशोधन के क्रम में नवां संविधान संशोधन जो दिनांक 17/01/61 को लागू हुआ, जिसके तहत प्रथम अनुसूची में परिवर्तन करते हुए , भारत पाक समझौते के क्रियान्वयन के लिए,असम, पंजाब, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के कुछ भूखंड तात्कालिक पाकिस्तान को सौंपे जाने का प्रावधान था। उक्त संशोधन में जलपाईगुड़ी का बेरूबाडी़ बांग्लादेश को सौंपा गया।जिसका तीव्र जनविरोध भी हुआ, बंगाल के तात्कालिक मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय ने भी इसका विरोध किया। जनविरोध के बाद भी नेहरू ने बेरूबाडी़ का आधा हिस्सा बांग्लादेश (तात्कालिक पाकिस्तान)को दे दिया।यह संशोधन भारत की संप्रभुतावाद पर कुठाराघात था।वस्तुतः यह संशोधन पाकिस्तान के तात्कालिक प्रधानमंत्री फिरोज खां नून और नेहरू के बीच हुए समझौते के लिए स्वार्थगत कारणों से किया गया।इस संशोधन ने भारत की अखंडता क्षतिग्रस्त किया। नेहरू के शासन में हुए 16वें संशोधन के जरिए अनुच्छेद 84,173और तीसरी अनुसूची में परिवर्तन करते हुए,वाक्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर को सीमित कर दिया। इंदिरा जी के प्रधानमंत्रित्व काल में कुछ ऐसे संविधान संशोधन हुए जिन्होंने संविधान की चूले हिला दी थी। 1971 में 24वां संविधान संशोधन करते हुए इंदिरा सरकार द्वारा यह व्यवस्था की गई कि,संसद संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती हैं। और संविधान में संशोधन करने वाले अनुच्छेद 368 में भी संशोधन किया गया। यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए वैधानिक अतिचार जैसा है। इसलिए आरोपों से पहले अपने अंदर झांक लेना भी आवश्यक रणनीति होती है, जो वर्तमान विपक्ष में नहीं है। इसी क्रम में 30 वां संविधान संशोधन करते हुए इंदिरा सरकार ने अनु०"133(1) में परिवर्तन करते हुए उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण किया। वहां प्रस्तुत होने वाली अपीलों को सीमित कर दिया।यह न्यायिक सर्वोच्चता को चुनौती थी। इसी तरह 1975मे़ श्रीमती इंदिरा गांधी ने 38 वां संविधान संशोधन दिनांक 01/08/1975 को लागू किया । जिसमें राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा और राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश को न्यायिक पुनर्विलोकन से बाहर कर दिया।डा०अंबेडकर ने न्यायिक पुनर्विलोकन को संविधान की आत्मा कहा है। उक्त संशोधन संविधान की आत्मा पर कुटिल प्रहार था। इसी तरह बयालीसवां संविधान संशोधन कर इंदिरा गांधी ने अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए संविधान की चूले हिला दी।इस संशोधन में उद्देशिका सहित अनु०31,ग,39,55,74,77,81,82, 82,83,312,,330,352 में व्यापक बदलाव किया गया।यह संशोधन मनमाने तरीके से संविधान का पुनर्निरीक्षण था। जबकि आपातकाल संसद की पूर्व जानकारी के बिना लगाया गया था। यह संशोधन संवैधानिक चीरण था,जो पहले कभी नहीं देखा। अतः कांग्रेस द्वारा सरकार पर संविधान बदलने का आरोप ठीक उसी तरह है जैसे "चलनी हंसे सूपा पर जिसमें पहले से बहत्तर छेद"।
बावजूद इसके निहितार्थ स्वार्थ के लिए विशेषतः जो संविधान संशोधन नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी के समय तक किये गये उन्होंने ने संवैधानिक मर्यादा को तार तार किया है।इसी तरह के कुछ संविधान संशोधनों को, कवि ने संविधान के दर्द के रूप में लिखा है, "मैं घायल हूं ।"
क्षत विक्षत हूं,
जिंदा हूं या मरा पड़ा,
खुद की नब्ज टटोल रहा हूं।
मैं भारत का संविधान हूं,
दिल की गांठें खोल रहा हूं।
?️ प्रियदर्शन
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